गांधी जी: राष्ट्रपिता या सिर्फ एक नेता? एक निष्पक्ष दृष्टिकोण !

गांधी जी: राष्ट्रपिता या सिर्फ एक नेता? एक निष्पक्ष दृष्टिकोण !
"राष्ट्रपिता" की कोई स्पष्ट संवैधानिक परिभाषा नहीं है, और अगर हम इस बात को ध्यान में रखें तो यह उपाधि किसी सरकारी दस्तावेज़ में भी दर्ज नहीं है। मोहनदास करमचंद गांधी को "राष्ट्रपिता" के रूप में संदर्भित करने का प्रचलन उनके स्वतंत्रता संग्राम में योगदान और अहिंसक आंदोलन की नेतृत्व की वजह से हुआ। पर क्या इस उपाधि का कोई कानूनी या आधिकारिक आधार है? इसका उत्तर नहीं में है।

दुनियाभर में 300 से अधिक देश हैं, और भारत के अलावा शायद ही किसी देश में "राष्ट्रपिता" जैसी उपाधि देने का चलन हो। यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि क्यों इस तरह की उपाधियाँ दी जाती हैं, और क्या हमें भेड़चाल में शामिल होकर बिना सोचे-समझे इसे मान्यता देनी चाहिए?

गांधी जी के योगदान को नकारा नहीं जा सकता, लेकिन उनका "बापू" या "राष्ट्रपिता" होना एक व्यक्तिगत विचारधारा का हिस्सा हो सकता है। जब गौ माता नहीं हो सकती, भगत सिंह और सुभाष चंद्र बोस को "राष्ट्रभाई" की उपाधि नहीं दी जाती, तो गांधी जी को "बापू" या "राष्ट्रपिता" मानने की क्या आवश्यकता है?

उनकी कुछ गतिविधियों पर सवाल उठाए जा सकते हैं, जैसे मंदिर में कुरान पढ़ना, पर मस्जिद में गीता न पढ़ना। उन्होंने पूरे देश में गरीबी का चेहरा प्रस्तुत किया, लेकिन उनके ट्रेन सफर और बकरी के चारे जैसे खर्चे भी थे जो चर्चा का विषय बने।

सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि गांधी जी ने धर्म के नाम पर देश का बंटवारा क्यों होने दिया? और क्यों उन्होंने यह नहीं सुनिश्चित किया कि अल्लाह और ईश्वर को समान रूप से माना जाए?

मैं इस लेख के माध्यम से किसी पर अपनी विचारधारा थोपने का प्रयास नहीं कर रहा, बल्कि यह एक सवाल है जो हमें सोचने पर मजबूर करता है। गांधी जी का "बापू" होना या न होना व्यक्तिगत विचारधारा पर निर्भर करता है। हमें एक निष्पक्ष दृष्टिकोण से इस पर विचार करना चाहिए और तथ्यों के आधार पर अपने मत बनाने चाहिए।

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