बिहार की राजनीति का नया अध्याय: एनडीए में उथल-पुथल और 'हांको रथ हम पान हैं' आंदोलन का बढ़ता प्रभाव |
बिहार की राजनीति का नया अध्याय: एनडीए में उथल-पुथल और 'हांको रथ हम पान हैं' आंदोलन का बढ़ता प्रभाव
बिहार की राजनीति में हर दिन नए मोड़ देखने को मिलते हैं, लेकिन हाल की घटनाओं ने कुछ ऐसे पहलू सामने लाए हैं जिनका असर आने वाले चुनावों में निश्चित तौर पर दिखेगा। एनडीए गठबंधन, जिसमें भाजपा, जदयू और अन्य दल शामिल हैं, इस समय कुछ गंभीर चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक ओर चिराग पासवान के बढ़ते कदम ने जहां एनडीए में अस्थिरता ला दी है, वहीं दूसरी ओर 'हांको रथ हम पान हैं' जैसे आंदोलनों ने बिहार के राजनीतिक परिदृश्य में एक नया जोश भरा है।
चिराग पासवान का एनडीए में बढ़ता कद
चिराग पासवान, जो लोजपा (रामविलास) के प्रमुख हैं, इन दिनों लगातार सुर्खियों में हैं। झारखंड और महाराष्ट्र में अपने समर्थकों के साथ उन्होंने एनडीए में अपनी अहमियत को बखूबी साबित किया। एनडीए में जदयू और भाजपा के बीच की खींचतान ने चिराग पासवान की भूमिका को और महत्वपूर्ण बना दिया है। भाजपा की रणनीति में चिराग पासवान को 'हनुमान' की तरह देखा जा रहा है, जो किसी भी विपरीत परिस्थिति में एनडीए के लिए निर्णायक साबित हो सकते हैं।
नीतीश कुमार की भूमिका पर सवाल
नीतीश कुमार के नेतृत्व वाली जदयू भी इस गठबंधन में एक विशेष स्थिति रखती है। मुख्यमंत्री के रूप में नीतीश कुमार का एनडीए में अलग ही कद है, और इसे वह किसी भी हाल में कमजोर नहीं होने देना चाहते। ठीक वैसे ही जैसे चीन सीमा पर ऊंचाई पर अपनी स्थिति से खुद को मजबूत बनाए रखता है, नीतीश कुमार भी अपने राजनीतिक कद को बनाए रखने के लिए पूरी कोशिश में हैं।
'हांको रथ हम पान हैं' आंदोलन: एक नई उम्मीद
जहां एनडीए गठबंधन में दरारें बढ़ रही हैं, वहीं दूसरी ओर बिहार में 'हांको रथ हम पान हैं' आंदोलन ने जनता में एक नई ऊर्जा का संचार किया है। इस आंदोलन का नेतृत्व कर रहे एर. आई. पी. गुप्ता ने पान समाज को संगठित कर अपनी मांगों को मजबूती से उठाया है। बिहार की सड़कों पर ‘हांको रथ हम पान हैं’ आंदोलन की रैलियां लगातार हो रही हैं, जिसमें पान समाज से जुड़े लोग बढ़-चढ़कर भाग ले रहे हैं।
गौरतलब है कि इस आंदोलन का उद्देश्य केवल पान समाज के हक की मांग नहीं है, बल्कि यह बिहार में एक नई राजनीति की दिशा तय कर रहा है। इस आंदोलन के तहत 17 नवंबर को जयनगर, 24 नवंबर को दरभंगा, 1 दिसंबर को बेगूसराय, 15 दिसंबर को सहरसा, 29 दिसंबर को पूर्णिया और 10 जनवरी को जमुई में रैलियां आयोजित की जाएंगी। इसके बाद 23 मार्च को पटना के गांधी मैदान में एक विशाल रैली के माध्यम से इस आंदोलन का समापन किया जाएगा।
बिहार की जनता के लिए एक बड़ा सवाल: क्या राजनीतिक दल समझ पाएंगे जनता की अपेक्षाएं?
एनडीए गठबंधन के अंदरूनी मतभेद और 'हांको रथ हम पान हैं' जैसे आंदोलनों की तेजी से बिहार की जनता के सामने नए विकल्प और सवाल उभर रहे हैं। एनडीए को एकजुट रखने के लिए भाजपा और जदयू को समझौतों पर विचार करना होगा, वहीं 'हांको रथ हम पान हैं' जैसे आंदोलन बिहार की राजनीति में एक नया विकल्प बनते नजर आ रहे हैं।
आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि चिराग पासवान की भाजपा के साथ निकटता, नीतीश कुमार की मजबूती बनाए रखने की रणनीति और ‘हांको रथ हम पान हैं’ आंदोलन की बढ़ती लोकप्रियता बिहार की राजनीतिक तस्वीर को कैसे बदलते हैं।
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