प्रवासी पान समाज का संघर्ष और बलिदान: कब तक सहेंगे बेबसी का दर्द ?

प्रवासी पान समाज का संघर्ष और बलिदान: कब तक सहेंगे बेबसी का दर्द?
पटना | बिहार का पान समाज दशकों से अपने हक के लिए संघर्ष कर रहा है, लेकिन प्रवासी पान समाज की पीड़ा कहीं ज्यादा गहरी है। मजबूरी में अपने गांव-घर से दूर जाकर दूसरे प्रदेशों में काम करना, अपनों से बिछड़कर जीवन बिताना, और आरक्षण के अभाव में अपने बच्चों का भविष्य अधर में लटकते देखना—यही उनकी हकीकत बन गई है।

बेटी ने पूछा – पापा, मैं कब आपके पास रहूंगी?

इंजीनियर आईपी गुप्ता ने एक ऐसी बच्ची की कहानी साझा की, जिसने हर प्रवासी पान समाज के श्रमिक की पीड़ा को उजागर कर दिया। उस बच्ची ने अपने पिता से सवाल किया, "पापा, मैं कब आपके साथ रहूंगी?" उसका पिता दिल्ली में ठेला लगाता है, सालों से मेहनत कर रहा है, लेकिन अपनी बेटी के साथ नहीं रह पाता। वह सिर्फ त्योहारों पर घर लौटता है, और बेटी की मासूम आंखें सालभर उसका इंतजार करती हैं।

"पापा बहुत याद आते हैं," वह बच्ची सिसक पड़ी। "अगर हमें भी आरक्षण मिलता, तो मेरे पापा गांव में ही रहते।"

आरक्षण से वंचित, मजबूरी में मजदूर बना पान समाज

आज लाखों पान समाज के लोग दिल्ली, कोलकाता, मुंबई, सूरत, बेंगलुरु जैसे शहरों में राजमिस्त्री, मार्बल मिस्त्री, ठेलेवाले, दिहाड़ी मजदूर बनकर काम कर रहे हैं। उनकी पीढ़ियां अपने माता-पिता से दूर रहकर बड़ी हो रही हैं। कई ऐसे हैं, जिन्होंने अपने बच्चों की परवरिश के लिए अपना पूरा जीवन संघर्ष में झोंक दिया, लेकिन फिर भी उन्हें सरकारी नौकरियों में कोई जगह नहीं मिली।

"जब हम बीमार पड़ते हैं, तो मां के स्पर्श के लिए तरसते हैं। पत्नी के हाथ से एक गिलास पानी भी नसीब नहीं होता। बच्चों को सीने से लगाने की चाह अधूरी रह जाती है," – ये दर्द हर प्रवासी पान समाज के मजदूर का है।

78 सालों से बलिदान, लेकिन अब और नहीं!

आईपी गुप्ता ने साफ कहा कि पान समाज 78 सालों से बलिदान दे रहा है, लेकिन अब यह सिलसिला खत्म होना चाहिए। अगर प्रवासी पान समाज के लोग भी अपने हक के लिए एकजुट नहीं हुए, तो आने वाली पीढ़ियां भी मजदूरी के लिए महानगरों में भटकती रहेंगी।

"अगर आप चाहते हैं कि आपके बेटे को आपके जैसा प्रवासी मजदूर न बनना पड़े, तो अब जाग जाइए। 13 अप्रैल 2025 को पटना के गांधी मैदान में जुटकर अपनी ताकत दिखाइए।"

क्या 13 लाख लोग जुटकर इतिहास बनाएंगे?

"अगर 13 लाख पान समाज के लोग एक साथ खड़े हो गए, तो सरकार खुद हमारे घर आकर हमें आरक्षण सौंपेगी।"

13 अप्रैल 2025 को बिहार का पान समाज यह साबित करेगा कि वह सिर्फ मजदूर नहीं, बल्कि एक सशक्त समाज है, जो अपने हक के लिए लड़ सकता है। 

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