क्या सीज़फायर के पीछे छिपा है Corporate या कोई बड़ा गेम? Bharat Pakistan War , IP गुप्ता ने खोली परतें !

भारत-पाकिस्तान सीज़फायर पर उठे सवाल: इंडियन इंकलाब पार्टी के नेता IP गुप्ता ने जताई नाराज़गी, कहा – ‘राष्ट्रवाद की भावना को झटका’

 APM Live News
भारत और पाकिस्तान के बीच हाल ही में घोषित सीज़फायर को लेकर देशभर में जहां एक ओर शांति की उम्मीदें जताई जा रही हैं, वहीं दूसरी ओर इस निर्णय पर तीखी प्रतिक्रिया भी सामने आने लगी है। इंडियन इंकलाब पार्टी के राष्ट्रीय नेता और सामाजिक कार्यकर्ता इंजीनियर IP गुप्ता ने एक वीडियो संदेश जारी कर सीज़फायर को लेकर गंभीर आपत्ति जताई है।

वीडियो में उन्होंने स्पष्ट कहा, “यह फैसला न केवल चौंकाने वाला है, बल्कि राष्ट्र की भावना के साथ भी एक प्रकार की अनदेखी है। क्या सरकार ने यह निर्णय लेते समय देशवासियों की राय ली? क्या यह फैसला अमेरिका या बड़े कॉरपोरेट्स के दबाव में लिया गया है?”

“बलोचिस्तान को लेकर अवसर गंवाया गया”
गुप्ता ने यह भी आरोप लगाया कि भारत के पास इस समय बलोचिस्तान को पाकिस्तान से अलग करने और क्षेत्रीय संतुलन स्थापित करने का एक ऐतिहासिक अवसर था, जिसकी अनदेखी की गई। उन्होंने कहा, “1971 की तरह भारत एक और निर्णायक कार्यवाही कर सकता था, पर सरकार ने पीछे हटकर यह अवसर गवां दिया।”

सीज़फायर के पीछे ‘कॉरपोरेट हित’ होने की आशंका
IP गुप्ता ने संदेह जताया कि इस निर्णय के पीछे देश के कुछ बड़े कॉरपोरेट घरानों और अंतरराष्ट्रीय दबावों की भूमिका हो सकती है। उन्होंने पूछा, “क्या पाकिस्तान के बंदरगाहों और हमारे उद्योगपतियों के बीच व्यापारिक लेनदेन सीज़फायर की मुख्य वजह बना?”

धार्मिक राजनीति बनाम राष्ट्रीय एकता
अपने बयान में उन्होंने यह भी कहा कि युद्ध के समय देश ने दिखा दिया कि भारत के लोग धर्म से ऊपर उठकर एक साथ खड़े हो सकते हैं। “हर धर्म, हर समुदाय के लोगों ने राष्ट्रवाद की मिसाल पेश की। ऐसे समय में अचानक पीछे हटना राष्ट्रवादी भावना को कमजोर करता है।”

राजनीतिक विरोध का एलान
IP गुप्ता ने अंत में इंडियन इंकलाब पार्टी की ओर से इस सीज़फायर के औपचारिक विरोध का एलान करते हुए कहा कि यह निर्णय जनता की भावना के विपरीत है और सरकार को इसका स्पष्ट उत्तर देना चाहिए।

यह बयान उस समय आया है जब भारत-पाकिस्तान संबंधों को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय भी नजर बनाए हुए है। IP गुप्ता के सवाल सरकार के रणनीतिक दृष्टिकोण, आंतरिक नीति और अंतरराष्ट्रीय दबावों के बीच संतुलन को लेकर नई बहस को जन्म देते हैं।

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